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    कश्मीर: सख़्ती बहुत हुई, अब थोड़ी नरमी दिखाए मोदी सरकार-नज़रिया

    सारांश:इमेज कॉपीरइटGetty Imagesमैं पिछले तीन हफ़्तों में जितनी भी बार श्रीनगर की गई हूँ, प्लेन के केबिन क्र

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      मैं पिछले तीन हफ़्तों में जितनी भी बार श्रीनगर की गई हूँ, प्लेन के केबिन क्रू ने हर बार प्लेन लैंड होने पर ख़ुशनुमा और बिना सोचे-समझे वही रोबोटिक लाइनें दुहराई हैं: अब आप अपने मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल कर सकते हैं.

      स्पीकर से जैसे ही ये आवाज़ आती है, प्लेन में सवार यात्री रूखी हंसी हंसते हैं. इन यात्रियों में से ज़्यादातर या तो पत्रकार होते हैं या फिर वो कश्मीरी जो अपने घर लौट रहे हैं और जिन्होंने कई दिनों से अपने घर बात नहीं की है.

      जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को ख़त्म किए जाने के आदेश के बाद से यानी पिछले तीन हफ़्ते से ज़्यादा वक़्त से मोबाइल, इंटरनेट और ब्रॉडबैंड सेवाए बंद हैं.

      कुछ इलाकों में लैंडलाइन चालू होने से थोड़ी राहत ज़रूर है लेकिन कश्मीर घाटी में संचार साधनों पर लगी रोक अब भी जारी है. ऐसे में फ़्लाइट में होने वाली ये अनाउंसमेंट (अब आप मोबाइल यूज़ कर सकते हैं) तंज़ जैसी लगती है.

      जिन लोगों पर कश्मीर में लगी इन पाबंदियों का असर पड़ा है- बच्चे जो अपने माता-पिता से बात नहीं कर पा रहे हैं, पति जिनकी अपनी पत्नी से बात नहीं हो रही है या फिर बीमार लोग जो अपने डॉक्टर से तुरंत संपर्क नहीं कर पा रहे हैं, उनके पास प्लेन में होने वाली इस 'क्रूर घोषणा' की विडंबना पर रूखी हंसी हंसने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.

      बुधवार को जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल सत्यपाल मलिक की प्रेस वार्ता ने मुझे एयरलाइन्स की इस अनाउंसमेंट याद दिला दीं. ऐसा इसलिए, क्योंकि मलिक की प्रेस कॉन्फ़्रेंस का तरीका फ़्लाइट में होने वाली इन्हीं अनाउंसमेंट की तरह आस-पास के माहौल से बेख़बर और बेकार था.

      लोगों को इंतज़ार था कि शायद सरकार इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कोई बड़ी घोषणा करे.

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      बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां क्यों?

      भारत सरकार पिछले काफ़ी वक़्त से कड़े फ़ैसले लेने और उन्हें लागू करने का दमखम पहले ही दिखा चुकी है. ऐसा लगा था कि सरकार इस बार शायद कुछ नरमी वाला रवैया दिखाएगी.

      मगर हुआ क्या? इसके बजाय दो-तीन महीने के अंदर 50 हज़ार खाली पद भरने की एक छोटी सी घोषणा हुई. इसके अलावा राज्यपाल ने भारतीयों को बड़े ही दरियादिल अंदाज़ में ये समझाने की कोशिश की कि जेल जाना देश की राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा होता है!

      उन्होंने अपना उदाहरण दिया और ख़ुद को '30 बार जेल जाने वाला शख़्स' बताया. इतना ही नहीं, जेल जाने के फ़ायदे बताते हुए उन्होंने ये भी कहा कि जेल जाने वाले लोग अच्छे नेता बनते हैं.

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      ये एक बेवकूफ़ी भरा तर्क है. सरकार के इस तर्क की सबसे कमज़ोर कड़ी है घाटी में होने वाली गिरफ़्तारियों की अस्पष्टता. श्रीनगर में एक अधिकारी ने मुझे बताया कि करीब 4,000 लोग गिरफ़्तार हुए हैं लेकिन सरकार ने इन नामों कोई आधिकारिक सूची सार्वजनिक स्थानों पर नहीं लगाई है.

      इससे भी बुरा ये है कि सबको एक साथ रखा गया है: फिर चाहे वो भारत के साथ खड़े रहने वाले मुख्यधारा के नेता हों, अलगाववादी हों, पत्थरबाज़ हों, पार्टी कैडर हों या फिर पंचायत स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता.

      जिन्होंने भारतीय ध्वज के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाई, उन्हें जेल में डालने को न्यायसंगत कैसे ठहराया जा सकता है?

      अगर तर्क ये है कि ये लोग परेशानी खड़ी कर सकते हैं या हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं तो फिर उन्हें ऐसे ख़ास आरोपों पर तब गिरफ़्तार करिए जब वो वाक़ई ऐसा करें. उन्हें अभी क्यों गिरफ़्तार किया गया है, इस बारे में पूरी अस्पष्टता है.

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      बुरहान वानी

      2016 की ग़लती नहीं दुहराना चाहता प्रशासन

      श्रीनगर में राज्य प्रशासन के अधिकारियों ने मुझे बताया कि पहले दिन से ही उनकी प्राथमिकता ये थी कि किसी की जान न जाए. उनका कहना था कि उन्होंने साल 2016 में की गई अपनी ग़लती से सबक लिया है, जब बुरहान वानी एक सुरक्षा ऑपरेशन में मारे गए थे.

      उस समय दो दिनों के भीतर 22 लोगों की मौत हो गई थी और एक हफ़्ते में 37 लोगों की जान जा चुकी थी. ये सारी मौतें सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए हिंसक संघर्ष में हुई थीं.

      अधिकारियों ने कहा कि वो ये ग़लती नहीं दुहराना चाहते. वाजिब बात है. ये बात समझ में आती है कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के फ़ैसले के तुरंत बाद इंटरनेट बंद करने पर इतना ज़ोर क्यों दिया गया.

      तकनीक की मदद से चलने वाले प्रोपेगैंडा के इस नए दौर में नई पीढ़ी के चरमपंथियों ने सोशल मीडिया को हथियार बनाया है. ऐसा करने वालों में बुरहान वानी भी थे जो सोशल मीडिया के ज़रिए कट्टरपंथ और फ़ेक न्यूज़ फैलाया करते थे और लोगों को हिंसा के लिए उकसाते थे.

      कोई भारतीय इस बात से असहमति नहीं जताएगा कि कोई भी फ़सैला लेते हुए सुरक्षा का ख़ास ख़याल रखा जाना चाहिए. इसलिए अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के फ़ैसले के बाद शुरुआत के कुछ दिनों में संचार और बातचीत के साधनों पर लगाम लगाना तर्कपूर्ण था.

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      इमेज कॉपीरइटGetty Imagesकश्मीरियों को भड़का रही है पाबंदियां

      हालांकि अब इस पाबंदी का बिल्कुल उलटा असर हो रहा है. स्थानीय लोग एक-दूसरे से बात नहीं कर पा रहे हैं. कई बार तो वो सरकारी हेल्पलाइन का इस्तेमाल करने के लिए घंटों कतार में खड़े रहने के बावजूद अपने बच्चों या माता-पिता से बात नहीं कर पाते हैं.

      कई बार उन्हें डॉक्टर और चिकित्सकीय मदद की ज़रूरत होती है लेकिन मदद मिलने में बहुत देर हो जाती है. ये सब लोगों के भीतर ग़ुस्सा बढ़ा रहा है और इस ग़ुस्से का 370 से कोई लेना देना नहीं है.

      इससे भी बुरा ये है कि जब संचार के साधन ठप हो जाते हैं, इंटरनेट बंद हो जाता है, सरकार का लोगों से संवाद नहीं होता और उन तक आधिकारिक जानकारी नहीं पहुंचती तब अफ़वाहें बातों के ज़रिए भी उतनी ही तेज़ फैलती है जितनी कि इंटरनेट के जरिए.

      इन दिनों कश्मीरी बेहद घबराए हुए हैं और बद से बदतर चीज़ें होने को लेकर आशंकित हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनसे साफ़ और पारदर्शी बातचीत नहीं हो रही है और न ही उन्हें सटीक जानकारी दी जा रही है.

      सूचना का ये अंधेरा सिर्फ़ उनकी भावनाएं भड़का रहा है, शांत नहीं कर रहा है. ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा का मकसद मुश्किल से पूरा हो रहा है. अब तो अनुच्छेद 370 को हटे भी तीन हफ़्ते हो चुके हैं. ऐसे में संचार साधनों पर लगी ये पाबंदी बढ़ाना बेकार और अवांछनीय है.

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      इमेज कॉपीरइटGetty Imagesआतंकवाद को हथियार बना सकता है पाकिस्तान

      आने वाले कुछ हफ़्ते कश्मीर घाटी के लिए ख़ास तौर से संवेदनशील और ऐहतियाती रहेंगे. इसके अंदरूनी और बाहरी दोनों पहलू हैं. अंदरूनी पहलू है: लोगों में उबलता असंतोष और बाहरी पहलू है पाकिस्तान.

      पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस मामले में दुनिया को दखल दिलाने की बेतहाशा कोशिश में दो बार परमाणु युद्ध की आशंका भी जता दी है. हालांकि अभी तक पाकिस्तान इस पूरे मामले में नाकामयाब रहा है.

      अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश तो की लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे स्पष्ट रूप से नकारने में सफल रहे.

      इतना ही नहीं, बहरीन और यूएई के अपने हालिया दौरे से पीएम मोदी पाकिस्तान को ये संदेश देने में भी कामयाब रहे कि कश्मीर मसले में मुस्लिम देश दखल नहीं देंगे.

      इसका मतलब ये है कि अब भारत को पाकिस्तान के उसके चिर परिचित 'अप्रत्यक्ष युद्ध' का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए. यानी भारत को आतंकवाद को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की आदत से सतर्क रहना चाहिए.

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      कश्मीर में सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान समर्थित समूह भारतीय सुरक्षा ठिकानों को वैसे ही निशाना बना सकते हैं जैसा कि उन्होंने उड़ी और पुलवामा में किया था.

      ऐसे संवेदनशील वक़्त में भारतीयों को आपस में झगड़ने से बचना चाहिए. यही वजह है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे सत्यपाल मलिक को ये कहते सुनना कि 'जो अनुच्छेद 370 का समर्थन करेंगे, उन्हें जूतों से पीटा जाएगा' बेहद निराशाजनक है.

      शायद ये बयान उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मद्देनज़र रखकर दिया था. राहुल गांधी ने मोदी सरकार की कश्मीर नीति की आलोचना की जिसे पाकिस्तान ने हाथोंहाथ लिया.

      हालांकि राज्यपाल के बयान ने गिरफ़्तार किए गए किसी भी मुख्यधारा के नेता या किसी भी भारतीय के लिए सरकार के फ़ैसले का शांतिपूर्ण विरोध करने का शायद ही कोई रास्ता छोड़ा है. जिस तरह की भाषा उन्होंने इस्तेमाल की (भले ही वो मुहावरे की भाषा हो), उसका शायद ही बचाव किया जा सकता है.

      बेशक़, सुरक्षा व्यवस्था एक बड़ी चुनौती है लेकिन लोगों की भावनाओं को संभालना भी ज़रूरी है. मोदी सरकार ने कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय बहस में एक बड़ी भू-राजनीतिक जीत हासलि की है.

      अब मोदी सरकार को थोड़ा मामले की तह तक जाने की ज़रूरत है. हमने सरकार की कड़ाई देख ली, अब एक कोमल स्पर्श की ज़रूरत है.

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